जीवनशैली और रोग
ऑस्ट्रियाई मनोवैज्ञानिक अल्फ्रेड एडलर ने १९२९ में किसी व्यक्ति के जीने की कला के लिए लाइफस्टाइल शब्द गढ़ा। व्यैक्तिक कार्य शैली और व्यक्तिगत व्यवहारिक प्राथमिकताओं ने शनैः शनैः शारीरिक और मानसिक दोनों बीमारियों को जन्म दिया है। दिन-प्रतिदिन की आदतें, जिनमें आसीन दिनचर्या शारीरिक गतिविधि का स्थान ले लेती हैं, पोषक आहार का स्थान कुपोषण ले लेता है, जल की कमी के साथ नींद का आभाव और तनाव ग्रस्त जीवनशैली स्वास्थ्य पर अपना प्रभाव डालने लगती है, जिसके परिणामस्वरूप कई रोगों की उत्पत्ति होने लगती है जिन्हें अब जीवनशैली से संबंधित व्याधियों के रूप में जाना जाता है। ये व्याधियां रोकथाम योग्य, चिरकालिक, गैर-संचारी, अस्वास्थ्यकर विकल्पों का परिणाम हैं। एक ऐसा ही अंतःस्रावी विकार जो प्रजनन आयु की महिलाओं को प्रभावित करता है, वह है पीसीओएस।
पीसीओएस क्या है?
पीसीओएस – यह चार अक्षरों वाला सरल सा एक परिवर्णी शब्द है। यह रोग एक पुरातन रोग है। सबसे पहले इस व्याधि का विवरण इटली में वर्ष १७२१ में प्रकाशित हुआ था जिसे अब पीसीओएस के रूप में पहचाना जाता है। हालांकि, स्टीन और लेवेंथल को पीसीओएस का पहला जांचकर्ता माना जाता है, जिन्होंने १९३५ में पीसीओएस के लक्षणों के साथ अनेक पीड़ितों को प्रस्तुत किया था। इसलिए, कभी-कभी पीसीओएस को स्टीन-लेवेंथल सिंड्रोम भी कहा जाता है। आठ दशकों से अधिक समय से ज्ञात होने के बाद भी, इसकी अंतर्निहित जटिलता के कारण इस पर अब भी शोध और जानकारी हासिल की जा रही है। पीसीओएस को एक बहुकारक विकार माना जाता है जिसमें विभिन्न अंतःस्रावी, चयापचय और आनुवंशिक घटक योगदान करते हैं। अक्सर अनियमित माहवारी या असफल गर्भाधान के कारण स्त्री रोग विशेषज्ञ के परामर्श की आवश्यकता होती है। जब इस तरह के प्रजनन सम्बंधित विकार हॉर्मोन के असंतुलन और / या चयापचय की गड़बड़ी के साथ युग्मित होते हैं, तथा पारिवारिक इतिहास के साथ, यदि कोई हो, तो उत्पन्न होने वाले लक्षणों की जटिलता को संक्षेप में पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम या पीसीओएस कहा जाता है।
आइए हम इन परस्पर सम्बंधित कारकों – हॉर्मोन, चयापचय, और आनुवांशिकता के बारे में एक-एक करके जानते हैं।
स्त्रीत्व का केंद्र बिंदु, प्रजनन प्रणाली का महत्वपूर्ण अंग है – अंडाशय। हर महिला के दो अंडाशय होते हैं जो हर महीने, एकान्तर रूप से एक अंडा (डिंब) (कई बार यह एक से अधिक) का उत्सर्जन करते हैं। यौवनवस्था में, अंडाशय हॉर्मोन का उत्पादन शुरू करते हैं जिनमें मुख्य हैं – एस्ट्रोजन – (स्त्री हॉर्मोन) और न्यून मात्रा में टेस्टोस्टेरोन – (पुरुष हॉर्मोन), अन्य हॉर्मोन जैसे प्रोजेस्टेरोन, एंटी-मुलेरियन हॉर्मोन और इन्हिबिन।
मासिक धर्म चक्र चलाने वाले हॉर्मोन
रजोदर्शन से रजोनिवृत्ति तक की कालावधि में, एक नारी का शरीर संभावित गर्भावस्था के लिए तैयार होने के लिए कई परिवर्तनों से गुजरता है। सामान्य परिस्थितियों में, मासिक आधार पर हॉर्मोन-चालित घटनाओं की पुनरावृत्ति जो औसतन २८ दिन (२१ से ३५ दिन तक) में घटित होती हैं इन्हें मासिक धर्म चक्र या माहवारी कहा जाता है। आमतौर पर, यह चक्र चार चरणों से गुजरता है – मासिक धर्म, कूपिक (फॉलिक्युलर), डिंबोत्सर्जन (ओव्यूलेशन) और ल्यूटियल / ल्यूटियमी चरण।
मासिक धर्म चरण: यदि उत्सर्जित डिंब का निषेचन नहीं होता है, तो एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हॉर्मोन का स्तर गिरने लगता है जिनकी आवश्यकता अन्यथा गर्भावस्था के दौरान होती है। इसी प्रकार गर्भाशय के अंदर की तैयार मोटी परत की भी अब आवश्यकता नहीं होती है, अतः उसे भी निष्कासित कर दिया जाता है। फलस्वरूप, रक्त और ऊतक गर्भाशय से योनि मार्ग द्वारा मासिक धर्म प्रवाह के रूप में निकलते हैं। ऐसी स्थिति को आमतौर पर माहवारी (पीरियड्स) कहा जाता है। जिस दिन यह रक्त-स्राव दिखाई देता है उसे मासिक धर्म के पहले दिन (या दिन १) के रूप में माना जाता है, और अगले चक्र की शुरुआत इसी दिन से होती है। यह चरण सामान्य रूप से औसतन पांच दिनों का होता है जो तीन से सात दिनों तक भी दिखाई देता है।
कूपिक चरण: इस चरण का प्रारम्भ तब होता है जब पीयूष (पिट्यूटरी) ग्रंथि को हाइपोथैलेमस ग्रंथि से संकेत मिलने पर FSH (फॉलिकल स्टिम्युलेटिंग हॉर्मोन) स्रावित होता है। जैसा कि नाम से पता चलता है, यह हॉर्मोन अंडाशय की सतह पर कूपि के विकास को उत्तेजित करता है। इनमें से प्रत्येक छोटी थैली जैसी संरचना या कूपि जो लगभग ५ – २० होते हैं, जो परिपक्वता के विभिन्न चरणों में होते हैं, उन सब में एक अपरिपक्व डिंब होता है। जबकि इन डिंब कोशिकाओं में से एक परिपक्व हो रही होती है, कूपि एस्ट्रोजेन हॉर्मोन (विशेषतः एस्ट्राडियोल) को स्रावित करना शुरू करते हैं जो भ्रूण के विकास की प्रत्याशा में गर्भाशय के अस्तर को मोटा करता है। कूपिक चरण मासिक धर्म चरण के साथ अधिव्यापित होता है, अर्थात, मासिक धर्म चक्र के पहले दिन (दिन १) से शुरू होता है और तेहरवें दिन (दिन १३) तक रहता है।
डिंबोत्सर्जन (ओव्यूलेशन) चरण: कूपिक चरण के दौरान एस्ट्रोजन के स्तर में वृद्धि पीयूष (पिट्यूटरी) ग्रंथि को एक अन्य हॉर्मोन, जिसे LH (ल्यूटिनाइजिंग हॉर्मोन) कहा जाता है, को स्रावित करने के लिए उत्प्रेरित करती है । यह हॉर्मोन डिंबोत्सर्जन की प्रक्रिया शुरू करता है तथा कूपि से एक डिंब या अंडे का उत्सर्जन होता है। डिंबग्रंथि नलिका (फलोपियन ट्यूब) द्वारा अंडाशय से निकला डिंब गर्भाशय में जाता है, जहां यह एक शुक्राणु द्वारा निषेचन की प्रतीक्षा करता है, जिसकी अवधि मात्र एक दिन (दिन १४) के लिए होती है। अन्यथा अनिषेचित डिंब गर्भाशय में विघटित हो जाता है।
ल्यूटियल / ल्यूटियमी चरण: डिंबोत्सर्जन के पश्चात्, वह कूपि जिसमें से अंडा या डिंब उत्सर्जित होता है, एक कॉर्पस ल्यूटियम में बदल जाता है। इस प्रकार से निर्मित कॉर्पस ल्यूटियम दो हॉर्मोन, प्रोजेस्टेरोन और एस्ट्रोजन, का उत्पादन शुरू करता है। यहाँ दो संभावनाएँ हो सकती हैं – या तो डिंब निषेचित हो जाता है या अनिषेचित रह जाता है। यदि अंडा निषेचित हो जाता है, तो कॉर्पस ल्यूटियम से स्रावित हॉर्मोन, प्रोजेस्टेरोन, गर्भावस्था की प्रारंभिक तैयारी में सहयोग करता है और यदि डिंब अनिषेचित रह जाता है तो कॉर्पस ल्यूटियम सिकुड़ने लगता है। कॉर्पस ल्यूटियम के प्रतिगमन के साथ, प्रोजेस्टेरोन और एस्ट्रोजन का स्तर भी नीचे गिरने लग जाता है। यह २८वे दिन तक, या जब अगला माहवारी चक्र फिर से शुरू होता है, तब तक रहता है।
संक्षेप में, प्रत्येक मासिक धर्म के दौरान, एक अंडा विकसित होता है और अंडाशय से निकलता है। यदि डिंब अनिषेचित रह जाता है, तो गर्भाशय के मोटे अस्तर को मासिक धर्म स्राव के माध्यम से निष्कासित कर दिया जाता है, और अगला मासिक धर्म चक्र शुरू हो जाता है। मासिक धर्म चक्र के प्रत्येक चरण की लंबाई प्रत्येक स्त्री में भिन्न भिन्न होती है और यह अवधि आयु के साथ साथ बदलती है।
हॉर्मोन का असंतुलन
जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, हॉर्मोन मासिक धर्म चक्र और प्रजनन क्षमता को सुचारू रूप से चलाने में हर कदम पर एक निर्णायक भूमिका निभाते हैं। जब एक अंडाशय एस्ट्रोजन का कम और टेस्टोस्टेरोन का अधिक स्राव करता है, तो कूपि (फॉलिकल्स) की परिपक्वता अवरुद्ध हो जाती है और ऐसी कूपि, द्रव-भरी पुटी (सिस्ट) बन जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप डिंबक्षरण (एनोव्यूलेशन) होता है यानि डिंब का उत्सर्जन नहीं होता है। नियमित मासिक धर्म चक्रों की तुलना में डिंबक्षरणी (एनोव्यूलेटरी) चक्र अक्सर अधिक दिनों के होते हैं। इस तरह की अनियमितता किसी भी स्तर पर यानि हाइपोथैलेमस, पीयूष ग्रंथि (पिट्यूटरी), अंडाशय या प्रणालीगत व्यवधान का परिणाम हो सकती है। अनियमित माहवारी में या तो दो चक्रों के मध्य लंबा अंतराल हो सकता है, माहवारी बिल्कुल भी नहीं हो, या एक महीने में अनेक बार हो सकती है। LH या इंसुलिन का स्तर जब अधिक होता है तब शरीर में टेस्टोस्टेरोन या पुरुष हार्मोन का उत्पादन बढ़ जाता है। मासिक धर्म चक्र की शुरुआत में यदि LH का स्तर FSH की तुलना में काफी अधिक हो तो डिंबोत्सर्जन (ओव्यूलेशन) के दौरान होने वाली LH की वृद्धि नहीं हो पाती है। यह डिंबोत्सर्जन में अवरोध पैदा करता है या डिंबक्षरण (एनोव्यूलेशन) का कारण बनता है और मासिक धर्म चक्र (पीरियड्स) अनियमित हो जाते हैं।
चयापचय और संबंधित विकार
अग्न्याशय (पैंक्रियास) द्वारा उत्पादित इंसुलिन रक्त में शर्करा के स्तर को नियंत्रित करता है। इंसुलिन प्रतिरोध के कारण शरीर में इसकी आवश्यकता की भरपाई के लिए अधिक मात्रा में इंसुलिन का उत्पादन होता है। इस प्रकार इंसुलिन का उच्च स्तर अंडाशय से शरीर में टेस्टोस्टेरोन का अधिक उत्पादन करने का कारण बनता है, इसके अलावा डिंबक्षरण (एनोव्यूलेशन) के कारण यह वजन बढ़ने का कारण भी बनता है। इससे स्थिति और खराब हो जाती है क्योंकि अधिक वसा की उपस्थिति अग्न्याशय को अधिक इंसुलिन का उत्पादन करने के लिए प्रेरित करती रहती है।
आनुवंशिकी और पीसीओएस
पीसीओएस कई बार अनेक परिवारों में पीढ़ी दर पीढ़ी पाया जाता है – जहां दादी, नानी, मां, या बहन का पीड़ित होना इसके बहन या पुत्री में होने की संभावना बढ़ा देता है। यह पीसीओएस के लिए आनुवंशिक श्रृंखला स्थापित करता है।
संक्षेप में, पीसीओएस के कारक अंतःस्रावी, चयापचय और कभी-कभी आनुवांशिक होते हैं।
लक्षण
पीसीओएस एक सिंड्रोम है, जिसका अर्थ है कि इस रोग में अनेक लक्षणों का समावेश होता है। इस व्याधि की तीन विशिष्ट विशेषताएं हैं: अंडाशय में कई पुटिकाएँ, पुरुष हॉर्मोन – टेस्टोस्टेरोन की अत्यधिक मात्रा और अनियमित माहवारी का होना। हालांकि लक्षण हर पीड़ित में भिन्न भिन्न होते हैं, किन्तु मोटापे का होना इसे अधिक गंभीर बनाता है।
हॉर्मोन के असंतुलन के कारण अंडाशय में अनेक पुटिकाएँ उत्पन्न होती है जो कि विशिष्ट लक्षण के रूप में दिखाई देती हैं। इन पुटिकाओं को अल्ट्रासाउंड सोनोग्रफी में मोतियों की श्रृंखला के रूप में देखा जा सकता है।
सर्वप्रथम तो इस रोग से पीड़ित को मासिक धर्म चक्र की अनियमितता का अनुभव होता है, जो या तो बहुत लम्बे अंतराल से होता है या नहीं होता है।
टेस्टोस्टेरोन (पुरुष हॉर्मोन) के स्तर में वृद्धि के कारण अतिरोमता (हिर्सुटिज़्म) हो सकती है, जिसमें अप्रत्याशित स्थानों पर अधिक बाल विकसित होते हैं, तैलीय त्वचा के साथ मुँहासे हो सकते हैं, और पुरुष प्रतिरूप गंजापन या सर से बालों के झड़ने का परिणाम हो सकता है।
शरीर में इंसुलिन प्रतिरोध के कारण इंसुलिन के उच्च स्तर होने पर वज़न बढ़ सकता है, यह मोटापा विशेष रूप से कमर के आसपास होता है।
निदान
किसी स्त्री रोग विशेषज्ञ से परामर्श हेतु जाने से पूर्व अच्छी तरह से तैयारी करके जाना बेहतर होगा – इसमें मुख्यतः अनुभव होने वाले प्रत्येक छोटे बड़े लक्षणों का पूरा विवरण, चाहे वे कितने भी महत्वहीन क्यों न लग रहे हों। पीसीओएस के पारिवारिक इतिहास, यदि कोई हो, तो उसका उल्लेख अवश्य करें। ये नैदानिक दृष्टिकोण पर निर्णय लेते हुए एक महत्वपूर्ण संकेत प्रदान करने में सहायक होते हैं। अंतर्निहित कारणों की पहचान करने के लिए शारीरिक परीक्षण, रक्त में विभिन्न हॉर्मोन का स्तर और अल्ट्रासाउंड बुनियादी नैदानिक साधन होते हैं।
उपचार
पीसीओएस को ठीक नहीं किया जा सकता है लेकिन हाँ, लक्षणों को कम करने के लिए इसका उपचार किया जा सकता है। समय पर चिकित्सकीय हस्तक्षेप और उचित अनुवर्तन भविष्य में होने वाली जटिलताओं को रोकने में सहायक हो सकते हैं।
ख्याल रखना
पीसीओएस का विकास अक्सर युवावस्था के आसपास विकसित होने लगता है। अगर इस पर ध्यान नहीं दिया जाये, तो यह आगे चलकर बढ़ती आयु के साथ दीर्घकालिक जटिलताओं को उत्पन्न कर सकता है – जिसमें शामिल हैं;
बांझपन
टाइप २ मधुमेह, गर्भकालीन मधुमेह
उच्च रक्तचाप, उच्च रक्त शर्करा, असामान्य कोलेस्ट्रॉल या ट्राइग्लिसराइड के स्तर जैसे चयापचय संबंधी गड़बड़ी, जिससे दिल से जुड़ी बीमारियों की संभावना बढ़ जाती है
अवसाद, चिंता, नींद और पाचन क्रिया के विकार
असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव
गर्भाशय अस्तर (एंडोमेट्रियम) का कर्करोग
चूंकि पीसीओएस एक जीवनशैली से सम्बंधित व्याधि है इसलिए आत्मनिरीक्षण ही बता सकता है कि जीवनशैली में क्या बदलाव लाने चाहियें। अच्छा पोषण, संतुलित आहार, शारीरिक गतिविधि के साथ नियमित रूप से व्यायाम करना संभवतः नहीं बल्कि निस्संदेह जीवन में एक बदलाव ला सकता है।
पीसीओएस की यह जानकारी संपूर्ण नहीं है और यह इसकी जटिल प्रकृति के कारण हो भी नहीं सकती है। लेकिन निष्कर्ष यह है कि भरपूर जीवन जीने के लिए जागरूक होना और ध्यान रखना अति आवश्यक है । अपने नारीत्व पर गर्व करें।
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